महर्षि दयानन्द के प्रति

श्री मदन लाल गुप्त 'मंगल' 2018-01-17


महर्षि दयानन्द के प्रति
रचयिता – श्री मदन लाल गुप्त ‘मंगल’
रचना काल - दिनांक 22.3.1966

ओ लोह पुरुष, ओ आर्य वीर! ॥
1. जन मन उपवन में दर्शन की अभिलाषाओं के खिले फूल ।
क्या दया तुम्हारी यही, आज हम याद करें तुम गये भूल ।
चालीस कोटि झोलियां बिछी क्या मिल न सकेगी चरण धूल ।
ओ योगी राज उतरो, फूलों में बन सुगन्धि प्यारे फकीर ॥ ओ लोह ... ॥

2. लग जाये पुनः आसन तेरा, है खुला द्वार खाली कुटीर ।
जन- जन मन- मन अब पीड़ित है क्या अब न करोगे दूर पीर
पतितों का काया कल्प करो, उस दिव्य ज्ञान से धीर वीर ।
आवाज दे रहा आर्य वंश को, आर्यवर्त का काश्मीर ॥ ओ लोह ... ॥

3. जिसके बलशाली हाथों से घातक तलवारें टूटी थी ।
ललकार सुनी जब रिक्ष राज ने (उसकी) जीवन आशा छूटी थी ।
ईटों के बदले में लड्डू, वितरण यह बात अनूठी थी ।
विषदाई जगन्नाथ को देकर प्राण दान खींची लकीर ॥ ओ लोह ... ॥